एडीएचडी (ध्यान आभाव अतिसक्रियता विकार) - जानिए लक्षण, कारण और निवारण

एडीएचडी (ध्यान आभाव अतिसक्रियता विकार) – जानिए लक्षण, कारण और निवारण

क्या आपका बच्चा भी पढाई पर और कुछ सीखने पर ध्यान नहीं देता है? और वह खेलकूद व अन्य कामों में जरुरत से ज्यादा सक्रीय है? यदि आपका उत्तर हाँ में है? तो हो सकता है की आपका बच्चा भी एडीएचडी से ग्रस्त हो?

यह एक मानसिक विकार है जो तंत्रिका तंत्र की गड़बड़ी से जुड़ा हुआ है। वर्तमान समय में लाखो बच्चे इससे पीड़ित है। यह एक लम्बे समय तक चलने वाली अवस्था है, जो बच्चों में बोलने, सीखने, ध्यान देने, और उनके व्यवहार पर विपरीत असर डालती है।

अगर आप बोलने संबंधी किसी भी समस्या का समाधान या फिर एडीएचडी के सम्बन्ध में अधिक जानकारी चाहते है तो 1800-121-4408 (निःशुल्क ) पर हमसे संपर्क करें।

तो आइये अब बात करते है की ध्यान आभाव अतिसक्रियता विकार (एडीएचडी) क्या है? यह किस प्रकार से बच्चों को तकलीफ प्रदान करती है? साथ ही इसके निवारण के उपाय और सुझाव भी जानिए।

एडीएचडी क्या है?

एडीएचडी बच्चों में बहुत अधिक पाया जाने वाला एक मानसिक विकलांगता का प्रकार है। और यह पीड़ित व्यक्ति के तंत्रिका तंत्र सम्बन्धी गड़बड़ी से सम्बन्ध रखता है। जिसमें बच्चा अपने अतिसक्रिय और आवेगी व्यवहार को नियंत्रित नहीं कर पाता है। उसे एक जगह पर टिक कर बैठने या गंभीरता से कोई काम करने में बहुत परेशानी होती है। हालाँकि लड़कियों के मुकाबले लड़कों में यह यह समस्या अधिक पायी जाती है।

ऐसे बच्चे आवस्यकता से अधिक चंचल और गतिविधियां करने वाले होते है। वह लगातार बदलते विचारों के परिणाम स्वरुप रोजमर्रा के कार्यों में भी ठीक से अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर सकते है, और बहुत जल्दी हतोत्साहित, परेशान, या ऊब जाते है। हालाँकि यह बचपन में शुरू होता है। फिर भी इसे बचपन के सामान्य विकारो की श्रेणी में नहीं रखा जाता है, क्योंकि यह किशोरावस्था तक जारी रहता है।

कौन से बच्चे ध्यानाभाव एवं अतिसक्रियता विकार से ग्रस्त नहीं कहलाते है?

यदि बच्चा गुस्सैल, बातूनी, खेल-खेल में झगड़ा करने वाला, और सीखने से मन चुराता है। परन्तु इन सभी के बाबजूद, यदि बच्चा अपने रोजमर्रा के काम और पढाई-लिखाई कर रहा है? तो वह एडीएचडी से ग्रस्त नहीं कहलायेगा। क्योंकि सामान्य बच्चे भी ऐसा व्यवहार करते है, पर एडीएचडी से ग्रस्त बच्चे का खुद पर नियंत्रण नहीं रहता है। उसका यह व्यवहार उसे स्कूल में, घर पर, और दोस्तों के साथ बहुत सी कठिनाइयों का सामना करवाता है।

एडीएचडी के प्रकार

ध्यानाभाव एवं अतिसक्रियता विकार (एडीएचडी) मस्तिष्क में उत्पन्न समस्या के कारण होता है जिसकी वजह से पीड़ित व्यक्ति अपने सामान्य व्यवहार पर अपना नियंत्रण खो देता है और उसमें असावधानी, सक्रियता, आवेग जैसी क्रियाएं देखने को मिलती है।

इसलिये एडीएचडी को निम्नलिखित प्रकारों में व्यक्त किया जा सकता है –

1. ध्यानभाव (इनटेन्टिव)

इस प्रकार से ग्रस्त एक व्यक्ति आसानी से अपने कार्य से भटक जाता है। उसमें लग्न और दृढ़ता का अभाव होता है। वह अपना ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई अनुभव करता है, और वह अव्यवस्थित भी होता है। हालाँकि यह समस्याएं समझ की कमी के कारण नहीं होती हैं।

साथ ही इनमें बातो पर ध्यान न देना, जरुरी तथ्यों को नजर अंदाज करना, कार्य शुरू करना पर उसे पूरा न कर पाना, दिन में सपने देखना और समय नष्ट करना शामिल है। ऐसे बच्चे कम दिमाग के और भुलक्कड़ लग सकते है, और अपनी चीजों का ध्यान नहीं रखते है।

2. अतिसक्रिय (हाइपरएक्टिव)

इससे पीड़ित व्यक्ति लगातार कुछ न कुछ करता ही रहता है। वह शांत और गंभीर हो कर नहीं रह सकता है। हालाँकि कुछ स्थितियों में लगातार बात करना या ऐसा व्यवहार करना अच्छा नहीं होता है। पर यह एडीएचडी से पीड़ित व्यक्ति के लिए अपनी बैचनी को जाहिर करने या बाहर निकालने में सहायता प्रदान करता है। चूँकि ऐसे बच्चे जरुरत के समय शांत, एक जगह नहीं बैठ सकते है और लापरवाही या गलतियां करते रहते है और ऐसे काम करते है जिससे दूसरों को परेशानी होती है।

3. आवेगी (इम्पल्सिव)

इस प्रकार से पीड़ित व्यक्ति खुद को साबित करने या अव्वल आने के लिए परिणामो की परवाह किये बिना जल्दबाजी में कोई भी काम कर सकता है। भले ही बाद में उस काम के परिणाम दूसरों के लिए भयानक साबित हों। एक आवेगी व्यक्ति किसी भी प्रकार के दीर्घकालिक परिणामो की कोई चिंता किये बिना ही महत्वपूर्ण निर्णय खुद ले सकता है। और दूसरों के काम में दखलंदाजी या बाधा उत्पन्न कर सकता है। क्योंकि वे दूसरों से इजाजत लेना या इंतज़ार करना पसंद नहीं करते है।

एडीएचडी के लक्षण

एडीएचडी से पीड़ित व्यक्ति अथवा किसी बच्चे में इसके तीनो प्रकार ध्यानभाव, अतिसक्रियता, और आवेग में से किसी भी एक प्रकार से जुड़े लक्षण प्रदर्शित हो सकते है। अथवा उसमें इन तीनो प्रकारों के सम्मिलित लक्षण भी पाए जा सकते है। ज्यादातर बच्चों में इनके मिश्रित प्रकार के मिले जुले लक्षण पाए जाते है। इसलिए इन सभी लक्षणों को प्रकारों के अनुसार निम्नलिखित श्रेणियों में व्यवस्थित किया गया है –

ध्यानाभाव (असावधानी) से ग्रस्त बच्चे में लक्षण –

  • किसी कार्य को करने के बीच में आसानी से ध्यान भटक जाना
  • कार्य को पूरा करने के लिए जरुरी निर्देशों का पालन न करना
  • दूसरों की बात पर ध्यान न देना, नजरअंदाज या अनसुनी करना
  • ध्यान से काम न करना, लापरवाही और गलतियां करना
  • रोजमर्रा के कामो को करना भूल जाना, काम याद न रहना
  • अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित व पूरा करने में परेशानी होना
  • गंभीरता से या ध्यान लगाकर किये जाने वाले काम पसंद न करना
  • दिन में सपने देखते रहना और अपनी चीजों का ध्यान न रखना

अतिसक्रीयता से ग्रस्त बच्चे में लक्षण –

  • किसी एक जगह पर शांत होकर न बैठ पाना
  • कुछ फुसफुसाते रहना या उछलकूद करना
  • इनमे अत्यधिक चंचल स्वभाव का होना
  • चुपचाप किसी खेल को खलने में दिक्कत
  • अधीर स्वाभाव के होना, कुछ न कुछ करना
  • हमेशा दौड़ते भागते रहना या कूदते रहना
  • जरुरत से ज्यादा बाते करने वाले होना
  • ऐसा प्रतीत होना की इनमें मशीन लगी हो

आवेगी व्यवहार से ग्रस्त बच्चे में लक्षण –

  • अपनी बारी आने का इंतज़ार न कर पाना
  • प्रश्न पूरा होने से पहले उसका उत्तर देना
  • दूसरों को लगातार परेशान करते रहना
  • अनुमति लिए बिना कोई भी काम करना
  • जो उनकी नहीं है वह चीजें रख लेना
  • बिना सोचे गंभीर खतरे मोल ले लेना
  • पकडे जाने पर भावनात्मक प्रतिक्रिया देना

किशोरों में पाए जाने वाले लक्षण –

  • बचपन की चंचलता होना
  • कमजोर याददाश्त होना
  • अनावस्यक चिंता करना
  • कम आत्मसम्मान होना
  • किस काम में परेशानी होना
  • गुस्से पर नियंत्रण न होना
  • आवेगपूर्ण व्यवहार होना
  • नशीले पदार्थों की लत होना
  • अव्यवस्थित व टालमटोलू होना
  • आसानी से निराश या बोर होना
  • ध्यान केंद्रित न कर पाना
  • मानसिकता में बदलाब होना
  • रिश्तों में समस्या होना

एडीएचडी के कारण

ध्यान आभाव अतिसक्रियता विकार या एडीएचडी के होने का कोई ठोस कारण शोधकर्ताओं द्वारा अभी तक ज्ञात नहीं किया गया है। पर शोधकर्ताओं का मानना है की यह बहुत से प्रकार के जोखिमों के कारण हो सकता है। हालाँकि यह अत्यधिक चीनी खाने, बहुत अधिक टीवी देखने, एक अव्यवस्थित जीवनशैली जीने, किसी बेकार स्कूल में पढ़ने, या खाद्य पदार्थों से एलर्जी होने से नहीं होता है। यह सभी कारण सिर्फ भ्रांतियां (ग़लतफहमी) और मनगढंत बाते है।

एडीएचडी से ग्रस्त होने की संभावनाएं और जोखिम निम्नलिखित है –

  • आनुवंशिक दोष : एडीएचडी विकार परिवारों के इतिहास में अनुवांशिक रूप में प्राप्त किया जाता है।
  • रासायनिक असंतुलन : एडीएचडी पीड़ितों के मस्तिष्क में उत्पन्न रसायन असंतुलित हो सकते हैं।
  • मस्तिष्क परिवर्तन : दिमाग के ध्यान नियंत्रक हिस्से एडीएचडी ग्रस्त बच्चों में कम सक्रिय होते हैं।
  • गर्भावस्था के दौरान : खराब पोषण, संक्रमण, धूम्रपान, शराब आदि का सेवन बच्चे के दिमागी विकास को प्रभावित कर सकती हैं।
  • विषाक्त पदार्थ : जहरीले तत्व जैसे सीसा, बच्चे के दिमाग के विकास को कुप्रभावित कर सकते हैं।
  • मस्तिष्क विकार या चोट : दिमाग के सामने की ओर (ललाट लोब) क्षति से आवेगों और भावनाओं को नियंत्रित करने में समस्या हो सकती है।
  • जन्म के समय : समय से पहले जन्म होना या जन्म के समय वजन कम होना भी एक कारक है।
  • मनोवैज्ञानिक दोष : भावनात्मक उपेक्षा या पारिवारिक हिंसा का बुरा असर भी बच्चे पर पड़ता है।

एडीएचडी से जटिलताएं

ध्यानाभाव एवं अतिसक्रियता विकार से पीड़ित बच्चों को उनकी गतिविधियों और व्यवहार के कारण अक्सर अलग नजरिये से देखा जाता है। जो लोग इस विकार को नहीं समझते है वह सोचते है की बच्चा सिर्फ ध्यान आकर्षित करने के लिए ऐसी हरकते कर रहा है। इस कारण उनसे रोषपूर्ण व्यवहार किया जा सकता है। और स्कूल व दोस्तों के बीच भी यही हाल होता है जो उनका जीवन कठिन बना देता है।

इसके अतिरिक्त बच्चों को निम्नलिखित जटिलताओं का सामना करना पड़ता है –

  • कक्षा में और पढाई के प्रति संघर्ष करना
  • पढाई में मन न लगना, मानसिक दबाव
  • चोटों और दुर्घटनाओं के प्रति संवेदनशील
  • आत्म सम्मान में कमी और हीनभावना
  • लोगों से जुड़ने और बोलने में कठिनाई
  • मादक पदार्थ और नशीली दवाओं की लत
  • एक आपराधिक व्यवहार प्रदर्शित करना

एडीएचडी की जाँच परिक्षण

एडीएचडी पीड़ित बच्चे या किशोर में लक्षणों की पुष्टि करने और यह सुनिश्चित करने के लिए, की इन लक्षणों की वजह कुछ और तो नहीं है? एक चिकित्सक बच्चे के दृष्टि और सुनने की क्षमता तथा श्रवणहानि का परिक्षण करता है। और आवस्यकता पड़ने पर वह बच्चे को किसी मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक के पास ले जाने की सलाह भी दे सकता है।

एडीएचडी का निदान करने के लिए, डॉक्टर बच्चे के स्वास्थ्य, व्यवहार और गतिविधि के बारे में कुछ प्रश्न पूछकर शुरुआत करते हैं। चिकित्सक माता-पिता और बच्चों से उन चीजों या तथ्यों के बारे में बात करते हैं जिन्हें उन्होंने देखा है। आपका डॉक्टर आपके बच्चे के व्यवहार के बारे में अधिक जाँच करने के लिए आपको और बच्चे के शिक्षक को एक चेकलिस्ट (प्रश्नोत्तरी) भरने के लिए कह सकता है।

सभी जाँच के अनुसार चिकित्सक निम्नलिखित तथ्यों की पुष्टि करता है –

  • बच्चे की सक्रियता या आवेगी व्यवहार सामान उम्र के अन्य बच्चों से अधिक है?
  • क्या बच्चे का यह व्यवहार उसके जन्म के समय से ही है?
  • बच्चे की सक्रियता और आवेगी व्यवहार उसके स्कूल और परिवार को प्रभावित कर रहा है?
  • स्वस्थ सम्बन्धी जाँच यह पुष्टि करती है की लक्षण किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या से नहीं है?

एडीएचडी का इलाज

एडीएचडी को रोका या पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता है। पर जितना जल्दी इसका पता चल जाये उतनी ही जल्दी इसके लक्षणों को नियंत्रित करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। और बच्चो और किशोरों को लक्षणों को प्रतिबंधित और नियंत्रित करने में सहायता प्रदान की जा सकती है। इसके लिए कुछ दवाओं, शिक्षा योजना, और चिकित्सा पद्धतियों के माध्यम से यह कर पाना संभव है।

इसके अंतर्गत आने वाली इलाज प्रक्रियाएं निम्नलिखित है –

1. दवाओं का प्रयोग

इस विकार से पीड़ित बहुत से बच्चों और व्यक्तियों में दवाओं के सेवन से लाभ प्राप्त होता है। जिससे उनकी सक्रियता, और आवेगी व्यवहार को नियंत्रित कर ध्यान केंद्रित करने, सीखने और मन लगाकर काम करने की प्रक्रिया में सुधार होता है। हालाँकि इनका असर बच्चों में अलग-अलग होता है इसलिए एक सटीक दवा मिलने तक विभिन्न दवाओं का सेवन करना पड़ सकता है। चिकित्सक बच्चे को निम्नलिखित प्रकार की दवाएं प्रदान करते है –

  • उत्तेजक दवाएं : यह दवा मस्तिष्क के रासायनिक डोपामाइन स्तर को बढ़ाती है। जो सोच और ध्यान में सुधार करती है।
  • गैर-उत्तेजक दवा : यह दवा इलाज में अधिक समय लेती हैं। लेकिन पीड़ित व्यक्ति में ध्यान, सक्रियता और आवेग में सुधार करती हैं।
  • अवसादरोधी दवा : हालाँकि इसे पूरी तरह मान्यता प्राप्त नहीं है फिर भी यह एडीएचडी पीड़ित वयस्कों के इलाज में इस्तेमाल की जा सकती है।

2. चिकित्सा पद्धति

एडीएचडी के इलाज के लिए विभिन्न प्रकार की चिकित्सा पद्धतियों द्वारा लक्षणों को समाप्त करने में सफलता नहीं मिलती है। पर रोगियों और परिवार के अन्य सदस्यों को आने वाली दैनिक चुनौतियों से बेहतर ढंग से निपटने में मदद मिल सकती है।

इसलिए इसके अंतर्गत निम्नलिखित चिकित्सा पद्धतियों को शामिल किया जाता है –

  • विशेष शिक्षा पद्धति : यह बच्चे को स्कूल में सीखने में मदद करती है। एक व्यवस्थित दिनचर्या होने से एडीएचडी वाले बच्चों को बहुत मदद मिलती है।
  • बिहेवियर थेरेपी : व्यवहार संशोधन बुरे व्यवहार को अच्छे व्यवहार में बदलने के तरीके सिखाता है।
  • मनोचिकित्सा (परामर्श) : पीड़ित को अपनी भावनाएं व्यक्त करने और आत्मसम्मान बेहतर बनाने में मदद मिलती है। और परिवार के लोगो को एडीएचडी ग्रस्त बच्चे को समझने में मदद मिलती है।
  • सामाजिक कौशल प्रशिक्षण : लोगों से जुड़ने के लिए बच्चे को आवश्यक व्यवहार सिखा सकते हैं।

3. शिक्षा और अभ्यास

एडीएचडी ग्रस्त बच्चों को अपनी समस्या को नियंत्रित करने और बेहतर प्रदर्शन के लिए अपने माता-पिता, परिवार, और शिक्षकों के मार्गदर्शन व सहयोग की आवश्यकता होती है। मनोचिकित्सक बच्चे के परिवार को स्थिति के बारे में शिक्षित कर सकते हैं। साथ ही बच्चे और उसके माता-पिता को नए दृष्टिकोण, कौशल और एक-दूसरे से जुड़ने के तरीके विकसित करने में भी मदद कर सकते हैं, इसके अंतर्गत –

  • पेरेंटिंग स्किल ट्रेनिंग : माता-पिता को वह कौशल सिखाता है। जिससे अपने बच्चों के सकारात्मक व्यवहार को पुरस्कार के माध्यम से प्रोत्साहित करना सिखाते हैं।
  • तनाव प्रबंधन : इन प्रकिया से पीड़ित बच्चों के माता-पिता को निराशा को नियंत्रित करने के तरीके सिखाते है। जिससे वह बच्चे के व्यवहार पर शांतिपूर्ण प्रतिक्रिया करें।
  • सहायता समूह : कुछ समूह माता-पिता को अन्य परिवारों के साथ जुड़ने का अवसर प्रदान करते हैं। जो की समान समस्या से ग्रस्त हैं।

4. स्कूल आधारित कार्यक्रम

कुछ स्कूल बच्चों को स्कूल के पाठ्यक्रम के अंतर्गत चलाये जाने वाले विभिन्न कौशल कार्यक्रमों के द्वारा विशेष रूप से व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाने की योग्यता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। और शिक्षा विशेषज्ञ बच्चों के माता पिता और शिक्षकों को कक्षा पाठ्यक्रम तथा घर के अभ्यास में आवश्यक परिवर्तन लाने में सहायता करते है। जिससे की बच्चे अपने विकार को और उसके लक्षणों को नियंत्रित कर बेहतर शिक्षा प्राप्त करने में सफल होते है।

रोकथाम व अन्य उपाय

ध्यानभाव एवं सक्रीयता विकार किसी भी बच्चे या व्यक्ति को हो सकता है। इसे पूरी तरह रोकना संभव नहीं है। यह सामन्य तौर पर बच्चे के व्यवहार और शैक्षिक योग्यता पर बुरा असर डालता है। जिससे बच्चा ख़राब व्यवहार और शैक्षिक प्रदर्शन के कारण समाज में पिछडने लगता है। इसलिए यह बेहद जरुरी है की बच्चे की सहायता की जाये।

इसके लिए बच्चे के माता पिता को निम्नलिखित सुझावों पर ध्यान देना चाहिए –

  • एडीएचडी के सम्बन्ध में अधिक जानकारी प्राप्त करें जिससे स्थिति की गंभीरता समझने और उससे निपटने में मदद मिल सके।
  • इससे पीड़ित बच्चे तनावग्रस्त होते है, इसलिए व्यक्ति पर होने वाले मानसिक तनाव को कम करने में मदद करें।
  • बच्चे में सकारात्मक व्यवहार का समर्थन करें, उसे सही प्रोत्साहन दें और आत्मनिर्भर बनने में सहायता प्रदान करें।
  • बच्चे पर चिल्लाएं या गुस्सा न करें बल्कि उसे प्यार और सहयोग से फिर एक बार कोशिश करने के लिए हौसला प्रदान करें।
  • बच्चे के सम्पूर्ण विकास के लिए एक बेहतर दिनचर्या का गठन करें और उसका पालन करने के लिए बच्चे को प्रोत्साहित करें।
  • बच्चे को अपनी व्स्तुओं या चीजों की अहमियत बताएं और उनका सही उपयोग करने के तरीके सीखने में सहायता करें।
  • बच्चे को घर के कुछ आसान काम और अपने काम खुद करने दें और उसे आत्मनिर्भर बनने का अवसर प्रदान करें।

पीड़ित व्यक्ति की सहायता

माता पिता और शिक्षक को चाहिए की पीड़ित व्यक्ति को अपनी मदद खुद करने के अवसर प्रदान करें। उन्हें दूसरे लोगों के भरोसे रहने की आदात कम करने में सहायता प्रदान करें। जिससे की वह अपने व्यक्तित्व और बेहतर भविष्य का निर्माण खुद करने में सक्षम हो सकें, इसके अंतर्गत –

1. बच्चों के लिए सुझाव

  • एक सटीक दिनचर्या और नियमों का पालन करने दें
  • सुबह जागने से रात को सोने तक पूरी दिनचर्या दोहराएं
  • स्कूल जाने, अपना होमवर्क करने की आदत डालने दे
  • बहार खेलने और घर में जरुरी कामों के लिए समय दें
  • किसी दिवार या फ्रिज पर उनके लिए निर्देश लिख दें
  • उन्हें प्रतिदिन अपनी वस्तुओं को सहेजने की आदत डालें
  • जिस वस्तु को जहाँ से उठाये उसे वही रखना सिखाएं
  • बच्चे को अपनी शैक्षिक गतिविधि करने का समय दें
  • उन्हें नियमों का पालन करने पर पुरस्कार जरूर दें

2. वयस्कों के लिए सुझाव

  • दिनचर्या का पालन करना
  • अपने प्रतिदिन के कार्यों की सूची बनाना
  • सूचि के अनुसार सभी कार्य समय पर पूरा करना
  • कैलेण्डर पर अपने भविष्य की योजनायें चिन्हित करें
  • कार्यों को सही समय पर करने के लिए रिमाइंडर लगाएं
  • सभी जरुरी चीजों के लिए अलग स्थान निश्चित करें
  • बड़े काम को करने के लिए उसे छोटे हिस्सों में विभाजित करें

निष्कर्ष व परिणाम

एडीएचडी एक गंभीर विकार है पर कई लोग सही तरीके से इसके उपचार और चिकित्सा पद्धतियों की सहायता से सफल और संपूर्ण जीवन जीते हैं। इस विकार के लक्षणों पर ध्यान देना और डॉक्टर से नियमित जांच करवाना महत्वपूर्ण है। क्योंकि कभी-कभी कोई दवा और उपचार जो बेहतर परिणाम दे रहे थे। अचानक वह काम करना बंद कर देते है। इसलिए आपको उपचार को बदलने की जरुरत भी हो सकती है। इसलिए निरंतर प्रयास करते रहें और बेहतर जीवन का आनंद लें।

अगर आप बोलने संबंधी किसी भी समस्या का समाधान या फिर एडीएचडी के सम्बन्ध में अधिक जानकारी चाहते है तो 1800-121-4408 (निःशुल्क ) पर हमसे संपर्क करें।

Leave a Comment