जन्मजात बहरापन – सिर्फ एक समस्या या अभिशाप? जानिए कारण और इलाज

जन्मजात बहरापन – सिर्फ एक समस्या या अभिशाप? जानिए कारण और इलाज

किसी एक या फिर दोनों कानों से आवाज को सुन पाने की क़ाबलियत में यदि कोई कमी होती है, तो इसे बहरापन कहा जाता है। पर जब यह समस्या किसी शिशु में उसके जन्म के समय से ही हो तब यह जन्मजात बहरापन कहलाती है।

जन्म से बहरापन होने की समस्या सुनने की योग्यता के स्तर में कमी के अनुसार अलग अलग हो सकती है। यह हल्के रूप से लेकर स्थायी भी हो सकती है। स्थायी बहरापन होने पर नवजात शिशु कुछ भी सुन नहीं सकते है। हालाँकि कई बच्चों में यह समस्या समय के साथ खुद ही ठीक हो जाती है।

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तो चलिए इस सम्बन्ध में और जानकारी प्राप्त करते है साथ ही जानते है की जन्मजात बहरापन क्या है? और इस समस्या के इलाज के लिए क्या साधन उपलब्ध है?

जन्मजात बहरापन

किसी बच्चे के जन्म लेने के साथ ही यदि उसके कान ध्वनियों को सुनने में सक्षम नहीं होते है। तो इसे जन्मजात बहरापन कहा जाता है। जन्म के समय से ही आवाज सुन सकने में असमर्थता बच्चों को कई प्रकार की समस्याओं से ग्रस्त कर सकती है। इनमे सबसे मुख्य है भाषा ज्ञान, क्योंकि बच्चे सुनकर ही बोलना सीखते है। और यदि वह सुन ही नहीं पाएंगे, तो उन्हें शब्दों को बोलने की समझ भी विकसित करने में मुश्किल होगी।

“दुनिया की लगभग 5 प्रतिशत आबादी को ठीक प्रकार से सुनाई नहीं देता है। और इनमें 3.2 करोड़ बच्चे हैं। भारतीय आबादी के लगभग 6.3 प्रतिशत में यह समस्या मौजूद है, और इस संख्या में लगभग 50 लाख बच्चे शामिल हैं”

इसलिए बच्चे के जन्म के समय ही उसके सुनने की शक्ति का परिक्षण भी करवा लेना चाहिए। जिससे सही समय पर समस्या का पता चल जाये और संभावित इलाज की प्रक्रिया को अंजाम दिया जा सके क्योंकि अक्सर ऐसा होता है की बच्चे की सुनने की क्षमता में कमी का पता चलते चलते कई वर्ष गुजर जाते है। और यदि इस समस्या का पता 4 साल की उम्र के बाद चले तो फिर रोग का इलाज करना मुश्किल हो जाता है।

जन्मजात बहरापन के प्रकार

किस नवजात बालक को जन्म के समय से ही होने वाली सुनने की समस्या को मुख्य रूप से दो प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है। यह सामान्यताः दो अवस्थाओं को प्रदर्शित करता है।

पहली जिसमें जन्मे के समय से ही शिशु को सुनवाई सम्बन्धी परेशानी होती है। जो की किसी पारिवारिक अथवा पूर्व कारण से होती है, या फिर प्रसव के समय हुई कुछ प्रकार की गड़बड़ियों का परिणाम होती है। जिससे प्रसव सामान्य नहीं होता है। ऐसे में कान की नस को कोई क्षति पहुंचने पर संवेदी बहरापन होना तय है।

दूसरी अवस्था या दूसरे प्रकार में शिशु के जन्म के समय तो उसकी श्रवण शक्ति बेहतर होती है। पर उसके बाद हो सकता है की, किसी प्रकार की कान की समस्या के होने या बिमारी का इलाज ठीक से न होने पर अथवा बच्चे के कान की साफ सफाई पर ध्यान न देना और कान में संक्रमण के फलस्वरूप कान की सुनने की शक्ति में कमी आ जाये या फिर वह नष्ट हो जाये।

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जन्मजात बहरापन के लक्षण

बच्चा जब छोटा होता है तो वह अपनी बात को कहकर आपसे नहीं बाँट सकता है या तो वह अपनी समस्या के लिए किसी प्रतिक्रिया का सहारा लेता है या फिर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता। जब हम सुनने की क्षमता की बात करें

जन्मजात बहरापन

तब एक छोटे बच्चे का किसी ध्वनि या आवाज के गूंजने पर प्रतिक्रिया न देना परेशानी की वजह बन सकता है। क्योंकि यह सामान्य रूप से ध्वनि का बच्चे के आंतरिक कान तक न पहुंचने का संकेत प्रदर्शित करती है। साथ ही आपको उनके व्यवहार को गौर से देखना होगा।

इसके अतिरिक्त आपको निम्न लक्षणों की जांच पड़ताल करनी पड़ेगी –

  • ध्वनि के गूंजने पर उस ओर न देखना
  • कान के पास ताली बजने पर न चौकना
  • पुकारने पर आपकी तरफ न मुड़ना
  • बहुत आधिक शोर पर प्रतिक्रिया देना
  • तेज़ आवाज में टीवी चलने पर न जागना

जन्मजात बहरापन के कारण

एक छोटा बच्चा 2 से 5 वर्ष की उम्र तक बड़ा होने पर अपने सुनने और बोलने के कौशल को विकसित कर लेता है। और आवाजों को सुनकर ठीक वैसी ही ध्वनि निकालने का प्रयास भी करता है। इसलिए कई मामलों में 4-5 वर्ष की उम्र तक आने पर बच्चे के सुनने की शक्ति में होने वाली कमी का पता चलता है।

इस अवस्था में संभावित इलाज करने की अधिकतर उम्मीद जा चुकी होती है। और फिर बच्चे को अपनी अवस्था से समझौता कर, उपकरणों और संकेतिक भाषा के प्रयोग से अपने सुनने की उम्मीद को हासिल करना होता है।

इसके मुख्य रूप से दो कारण हो सकते है जिनमें –

1. अनुवांशिक कारक

जब बच्चे के परिवार के किसी भी सदस्य को सुनने सम्बन्धी परेशानी हो, या फिर बच्चे के खानदान में यह समस्या पुराने समय से चली आ रही हो। तब यह सम्भावना बहुत अधिक बढ़ जाती है की, बच्चा भी जन्म के समय से ही बहरापन से पीड़ित हो या फिर यह परेशानी जन्म के कुछ वर्षों के बाद भी अपने आप विकसित हो सकती है।

ऐसी अवस्था में बच्चे की बिमारी का प्राम्भिक चरण में पता लग जाने पर कुछ सहायता की जा सकती है। अन्यथा बाद में सामने आने वाली ऐसी समस्या में बहुत अधिक सहायता कर पाना मुश्किल होता है। अनुवांशिक या जेनेटिक कारण से होने वाली श्रवण हानि बच्चे को अपने माता या पिता अथवा दोनों से विरासत में प्राप्त होती है।

2. गैर-अनुवांशिक कारक

इस प्रकार के करणों में बच्चे के पारिवारिक इतिहास का कोई योगदान नहीं होता है। बच्चा जन्म से पहले ही या फिर जन्म प्रक्रिया के दौरान किसी प्रकार की समस्या से या आघात से आपने सुनने की क़ाबलियत खो सकता है। हालाँकि कुछ मामलों में असुरक्षित प्रसव या इस दौरान दी जाने वाली किसी दवा के दुष्प्रभाव से भी यह हो सकता है।

जन्मजात बहरापन के गैर अनुवांशिक कारण निम्न लिखित है –

जन्मजात बहरापन
  • जन्म के समय बच्चे के वजन में कमी
  • गर्भावस्था के समय अल्कोहल का सेवन
  • धूम्रपान या अन्य विषाक्त पदार्थ लेना
  • गर्भ के समय दी गयी दवा के दुष्प्रभाव से
  • माँ के पेट में बच्चे को कोई संक्रमण होना
  • प्रसव के समय हुई गड़बड़ी, चोट या आघात
  • जन्म के समय से ही किसी कान का ना होना
  • जन्म के समय से ही कान के पर्दे में छेद होना

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3. कुछ अन्य कारण

इन सभी मुख्य कारणों के अतिरिक्त भी ऐसे कई कारण है। जिन्हे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। यह कारण बच्चे के जन्म के बाद के प्रारंभिक वर्षो में हो सकते है। और श्रवण हानि का कारण बनते है।

जन्मजात बहरापन के यह सभी अन्य कारण निम्नलिखित है –

जन्म से बहरापन

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जन्मजात बहरापन की रोकथाम

हालाँकि जन्मजात बहरापन के मामले में किसी बच्चे की सहायता सिर्फ समय रहते ही की जा सकती है। पर फिर भी कुछ ऐसी सावधानियां और रोकथाम के उपाय है। जिन्हे यदि आप गर्भधारण करने से पहले सुनिश्चित कर लें तो लाभ होगा या फिर शिशु के जन्म के बाद इन सावधानियों को रखने से हो सकता है की भविष्य में आपको ऐसी समस्या का सामना न करना पड़े।

जन्मजात बहरापन की रोकथाम के यह सुझाव निम्नलिखित है –

1. जन्म से पहले

यदि आप गर्भधारण कर माँ बनना चाहती है, या फिर आप माता पिता बनने का सुख प्राप्त करना चाहते है। तो बच्चे के जन्म से पूर्व गर्भावस्था के दौरान आवश्यक सावधानियां अवश्य बरतें।

गर्भधारण के समय जरुरी सभी सावधानियां निम्नलिखित है –

गर्भधारण
  • गर्भावस्था के समय जरुरी सभी इंजेक्शन लगवाएं
  • अपना और बच्चे के पोषण का सम्पूर्ण ध्यान रखें
  • नशीले / मादक पदार्थों का सेवन बिलकुल न करें
  • किसी भी दवा के सेवन से पहले डॉक्टर से सलाह लें
  • अनावस्यक दवाओं का सेवन बिलकुल भी न करें
  • अधिक से अधिक सावधानी रखने का प्रयास करें

2. जन्म के बाद

नवजात शिशु को बहरेपन से बचाने के लिए उसकी सम्पूर्ण सेहत के साथ उसके कानों का भी विशेष ख़याल रखना चाहिए। इसके लिए यह बेहद आप कुछ सामान्य देखभाल के नियमों का पालन करें।

शिशु के जन्म के बाद निम्नलिखित सावधानियां बरतें –

कान की जांच
  • बच्चे के कान से जुडी किसी भी समस्या पर धयान दें
  • लापरवाही न करें और तुरंत किसी डॉक्टर को दिखाएँ
  • बच्चे के कान में पानी न जाने दें उसके कान सूखे रखें
  • कान में पानी जाने पर तुरंत उसे निकालें, कान सुखाएं
  • बच्चे को नहलाते समय साबुन, शैम्पू का झाग न जाने दें
  • बच्चे की सफाई का पूरा धयान रखें, साफ कपडे पहनाएं
  • बच्चे को जरुरी सभी बिमारियों के टीके अवश्य लगवाएं

जन्म से बहरापन के लिए टीकाकरण

बच्चे के जन्म से पहले और जन्म के बाद यदि आप उपरोक्त सावधानियां और सुझावों को ध्यान रखें तो काफी हद तक बच्चे को इस गंभीर समस्या से दूर रखा जा सकता है। फिर भी ऐसे कुछ कारक है जिनका डर हर माता-पिता को हमेशा बना रहता है। वह है बीमारियां, हालाँकि इस बात से घबराने की जरुरत आज के समय में नहीं है।

क्योंकि सभी जानलेवा बिमारियों से नन्हे बच्चों को बचाने के लिये जरुरी टीके उपलब्ध है। और यह टीके सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में लगाए जाते है। इसलिए यह बेहद जरुरी है की बच्चे को जन्मे के बाद सही समय पर और निश्चित अंतराल में सभी जरुरी टीके लगवाए जाएँ।

“इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के अनुसार, अधिकांश मामलों में समय पर उचित टीकाकरण कराके, ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करके और कुछ दवाओं के इस्तेमाल से जन्मजात बहरापन को रोका जा सकता है।”

बच्चों को बीमारियों से बचाने और बहरापन के लिए टीकाकरण की उपयोयता को समझना हर नव दंपत्ति का दायित्व है। इनकी जानकारी डॉक्टर आपको बच्चे के जन्मे के समय ही दे देता है। इसलिए टीकाकरण में लापरवाही करना बिलकुल समझदारी नहीं है।

( और पढ़ें – बहरापन का आयुर्वेदिक इलाज जानिए )

जन्मजात बहरापन का इलाज

बच्चे को जन्म से ही सुनाई न देना, आनुवांशिक (जेनेटिक) और गैर-आनुवांशिक दोनों प्रकार की वजहों से हो सकता है। इस समस्या से ग्रस्त होने पर कई बार बच्‍चे बोल पाने में भी असमर्थ होते हैं और मानसिक रूप से भी बीमार हो सकते हैं। इन सबका बच्‍चे की मनोदशा पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। और आजीवन इस कष्ट के साथ बच्चे को रहना पड़ सकता है।

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पर वर्तमान समय में जहाँ तकनिकी और चिकित्सा के क्षेत्र में विकास जोरों पर है। कई ऐसी नवीनतम तकनीक है जिससे की जन्मजात बहरापन से जीझ रहे बच्चे भी फिर से बेहतर प्रकार से ध्वनियों को साफ़ और स्पष्ट सुन सकते है। इसके लिए पीड़ित बच्चे के जन्म से 6 माह के भीतर ही उसका इलाज शुरू कर दिया जाना चाहिए।

इसके अतिरिक्त निम्न उपायों की मदद से भी बच्चे को लाभ मिलता है –

1. कान की मशीन

कान की मशीन या फिर श्रवण यंत्र देखने एक छोटा, इस्तेमाल में आसान, बेहद हल्का और उच्च तकनिकी क्षमता से युक्त उपकरण है। यह वातावरण में मौजूद ध्वनियों को एकत्रित करके उनकी तीव्रता को सुनने वाले की सुविधा के अनुसार बढ़ा देता है। इस यंत्र से निकलने वाली ध्वनियाँ निम्न से लेकर गंभीर श्रवण हानि से पीड़ित बच्चों को लाभ पहुँचाती है।

2. कॉक्लियर इम्प्लांट्स

यह तरीका तब काम आता है जब बच्चे के श्रवण तंत्र में कोई क्षति हो जाये, या फिर बच्चा जटिल रूप से सुनने की समस्या से ग्रस्त हों और उसे कान के उपकरण से बहुत कम लाभ प्राप्त हो रहा हो या फिर लाभ नहीं मिल रहा हो।

बच्चे के आंतरिक कान में पाए जाने वाले कर्णावत (कोक्लीअ) का प्रत्यारोपण सर्जरी के द्वारा किया जाता है। और डॉक्टर उसके स्थान पर एक कॉक्लियर इम्प्लांट लगा देता है। यह इम्प्लांट क्षतिग्रस्त हुई संवेदी कोशिकाओं के स्थान पर काम करता है, और श्रवण तंत्रिका को फिर से काम करने लायक बनाता है।

3. स्पीच थेरेपी

जन्मजात बहरेपन के शिकार बच्चों में भाषा का सही ज्ञान विकसित नहीं हो पाता है। क्योंकि बच्चे की सुनकर सीखने की क्षमता कुप्रभावित हो चुकी होती है, और बच्चा ध्वनियों को ठीक प्रकार से सुन नहीं सकता है। इसलिए चीजों को सीखने में उसे बहुत दिक्कत का सामना करना पड़ता है। इसलिए स्पीच थेरेपी आपके बच्चे की उचित सहायता कर सकती है।

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स्पीच थेरेपिस्ट कई प्रकार की खेलने वाली और मनोरंजक गतिविधियों द्वारा आपके बच्चे के भाषा ज्ञान और कौशल को विकसित करने में सहायता करता है। जिससे उनके हकलाने और तुतलाने जैसी समस्या भी ठीक हो जाती है।

4. सांकेतिक भाषा

यह बिलकुल आखिरी विकल्प है, यदि कोई शिशु स्थायी बहरेपन का शिकार हो जाता है। तब किसी अन्य चिकित्सा पद्धति और उपकरणों से उसे कोई विशेष सहायता प्राप्त नहीं होती है। इस स्थिति में वह केवल सांकेतिक भाषा का प्रयोग करके ही अपनी बात समझा सकता है।

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इसके लिए उसे सांकेतिक भाषा को सीखना पड़ता है। सांकेतिक भाषा या इशारों की भाषा में हाथों द्वारा विशेष आकृतियां बनाकर शब्दों को व्यक्त किया जाता है।

निष्कर्ष व परिणाम

कान किसी भी बच्चे के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण किरदार अदा करते है। यह उसे अपने आसपास हो रही सभी गतिविधियों को समझने का अवसर प्रदान करते है। साथ ही नयी-नयी चीजें और व्यवहार सीखने में मदद भी करते है। एक बच्चा जब अपने विकास के प्रारंभिक और सबसे अहम् चरण में होता है।

तब उसके कान उसे भाषा ज्ञान और बोलना जैसे कौशल विकसित करने में सहायता करता है। इसलिए जन्मजात बहरापन से बच्चे को बचाने के लिए जरुरी सावधानियां और टीकाकरण का विशेष ख़याल रखें। जिससे बच्चा बेहतर सुने व स्वस्थ रहे।

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